बीते दिन की बात है 'कजरी'
वार्ता
सुल्तानपुर,
शुक्रवार,
जुलाई 25,
2008
सावन की रिमझिम फुहारों के बीच बाग-बगीचों और घर के दरवाजे के आगे नीम के पेड़ पर डाले गए झूले की पींगों के बीच सुमधुर धुन बिखेरते कजरी गीत अब बीते दिन की बात हो गई है।
सावन के ये परम्परागत झूले और कजरी गीत अब सीमित दायरे में सिमट कर रहे गए हैं। इनकी मौलिकता अब भारतीय संस्कृति के मूल गांव से भी गायब हो चली है। बाग-बगीचों में झूले और हरे-भरे सावन की फुहारों के बीच से छनकर आती कजरी गीतों की स्वर लहरियां अब शायद ही कहीं सुनने को मिल रही हों।
किशोरियों, नवविवाहिताओं, महिलाओं एवं बच्चों की तमाम मान्यताओं और भावनाओं के साथ जुड़ा सावन महीना भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित रहता है। सावन में पड़ने वाली नागपंचमी एवं राखी का पर्व बड़े महत्व का होता है। उस दौरान कभी लोकगीतों, तो कभी कजरी गीतों तथा गांव-गांव में झूलों की धूम रहती थी।
झूले पर झूलती बालाओं, महिलाओं के मुख से निकले गीत लोगों को न सिर्फ बरबस आकर्षित करते थे बल्कि पूरे माहौल को रसमय बना देते थे। इस माह में पूरा परिवेश उमंग और उत्साह से भर जाता था।
आधुनिकता की होड़ तथा जमाने के साथ बढ़ी लोगों की व्यस्तता ने इन सभी परंपराओं को दरकिनार कर दिया है।