प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राजनीति में रहते हुए भी 'अराजनीतिक व्यक्ति' की छवि का लाभ लंबे समय तक उठाते रहे हैं। बैंकर और नौकरशाह मनमोहन का राजनीति में प्रवेश वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के जरिये हुआ, जब राव ने अपनी अल्पमत सरकार में मनमोहन को वित्तमंत्री बनाया और इन्हीं दोनों को भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का श्रेय दिया जाता है। उदारीकरण देश के कितने और किन तबकों के हित में रहा है, यह अलग विषय है, लेकिन देश के कॉरपोरेट हलकों और इलीट समूहों में इसकी खूब तारीफ होती रही है और मनमोहन की नायक जैसी छवि के पीछे दरअसल यही सबसे बड़ी वजह रही है।
मीडिया और संभ्रांत तबकों में इस छवि का शोर ऐसा रहा है कि यह बात सिरे से भुला दी गई कि उदारीकरण के उसी दौर में देश में उस वक्त तक का सबसे बड़ा घोटाला हुआ। इस प्रतिभूति घोटाले, जिसे हर्षद मेहता घोटाले के नाम से ज्यादा जाना जाता है, की जांच के लिए बनी संसदीय समिति ने घोटाले के लिए मनमोहन को जिम्मेदार ठहराया था। यह रिपोर्ट आने के बाद मनमोहन ने पद छोड़ने की भी पेशकश की थी, जिसे नरसिंह राव ने नामंजूर कर दिया और इस तरह इस्तीफे का नाटक बिना अंजाम तक पहुंचे पूरा हो गया था।
उसी दौर में जब राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा गया तो सरकार बचाने के लिए राव और उनके सत्ता प्रबंधकों ने सारी मर्यादाएं तोड़ दीं। झारखंड मुक्ति मोर्चा घूस कांड उसी दौर की घटना है, जब वोट खरीदने के लिए चार झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) सांसदों के खाते में 50 लाख रुपये जमा कराए गए। झामुमो कांड के शोर-शराबे के बीच नरसिंह राव की बदनाम सरकार के मंत्री बने रहे मनमोहन। तब जिन सांसदों को पैसे दिए गए, उनमें शिबू सोरेन भी थे। इस बार विश्वासप्रस्ताव के कामयाब होने के लिए मनमोहन को भी सोरेन की जरूरत पड़ी, लेकिन इस बार उन्हें मंत्री बनाने का वादा कर सरकार के सत्ता प्रबंधक उनकी पार्टी के वोट 'खरीदने' में कामयाब रहे।
उस वक्त सत्ता से हटने के साथ ही नरसिंह राव को उनके कारनामों ने घेर लिया था। लखूभाई पटेल, सेंट किट्स और झामुमो कांडों का शिकंजा ऐसा कसा कि उनके जेल जाने की नौबत आ गई। उस वक्त नरसिंह राव कांग्रेस अध्यक्ष भी थे और लोकसभा में पार्टी के नेता भी। देश के इलीट समूहों में राव का बड़ा प्रशंसक समूह पैदा होने के पीछे की वजह 1991-96 की उदारवादी नीतियों के अलावा, उनके बारे में यह धारणा भी थी कि कांग्रेस पर से नेहरू-गांधी परिवार का कब्जा कमजोर करने में वह सफल रहे थे। जाहिर है, 10, जनपथ के प्रति अपनी वफादारी से पार्टी में अहमियत पाने वाले नेता और राव से अन्य वजहों से असंतुष्ट गुट जिस मौके की तलाश में थे, वह राव के मुकदमों से घिरने से उनके सामने आ गया। जब उस मौके पर राव अपने अस्तित्व की लडा़ई लड़ रहे थे और अपने वफादार नेताओं के समर्थन की उन्हें बेहद जरूरत थी, उस वक्त मनमोहन ने उनका साथ छोड़ दिया।
तब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में मनमोहन ने जो टिप्पणी की, वह खूब प्रचारित हुई। उन्होंने राव को निशाना बनाते हुए कहा - सीज़र की पत्नी को संदेह से ऊपर होना चाहिए। मतलब था कि अगर राव संदेह के घेरे में हैं तो उन्हें कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि मनमोहन की यह टिप्पणी राव के तुरंत पतन की वजह बनी... और इसके साथ मनमोहन ने 10, जनपथ में जगह बना ली। तब से आज तक वही 10, जनपथ उनकी सत्ता और हैसियत का स्रोत रहा है।
वरना मनमोहन ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने आज तक कोई बड़ा चुनाव नहीं जीता। एक बार लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरे तो दक्षिण दिल्ली संसदीय क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी के विजय कुमार मल्होत्रा ने उन्हें भारी अंतर से हराया। तब से उनकी सारी संसदीय राजनीति राज्यसभा में ही सीमित रही है। वहीं से कांग्रेस संसदीय दल के नेता बन गए। साफ है, राजनीति में उनका अपना कोई दीर्घकालिक दांव नहीं है, इसलिए भारत-अमेरिका परमाणु करार जैसे मुद्दे पर वह गठबंधन राजनीति की बुनियादी शर्तों की अनदेखी का दांव खेलने की स्थिति में थे। उन्हें इस बात की फिक्र नहीं थी कि उन्हें समर्थन दे रहे वामपंथी दलों के लिए यह मुद्दा विचारधारा से जुड़ा था, जिस पर ये दल समझौता नहीं कर सकते थे। अब अपनी जुगाड़ क्षमता से बहुमत जुटा लेने के बाद वह संसद के मंच पर यह ऐलान कर सकते हैं कि वामपंथी उन्हें बंधुआ गुलाम बनाना चाहते थे, बिना यह बताए कि चार साल तक गुलाम रहना उन्होंने क्यों पसंद किया...
इस मुद्दे पर गठबंधन की मजबूरी को गुलामी बताने वाले मनमोहन को अपनी सरकार में दागी छवि के नेताओं को मंत्री बनाए रखने में कोई हिचक नहीं हुई। यहां गठबंधन की मजबूरी का तर्क कांग्रेस नेताओं का हथियार बन रहा है। जिस एक नेता, यानी शिबू सोरेन के खिलाफ इस मुद्दे पर उन्होंने कड़ा रुख अपनाया, उन्हें भी अब वह मंत्रिमंडल में वापस लाने को सहज तैयार हो गए है। 'लेफ्ट की गुलामी' से आजाद होने के लिए, उन्हें आनन-फानन में लखनऊ हवाई अड्डे का नाम चौधरी चरण सिंह के नाम पर रखना मंजूर हो गया, ताकि अजित सिंह की पार्टी के तीन वोट उन्हें मिल सकें। अगर मीडिया की खबरों पर भरोसा करें तो उन्हें पीएमओ के बड़े अफ़सरों, और सीबीआई जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल सरकार के लिए समर्थन जुटाने में करने में कोई हिचक नहीं हुई। और जाहिर है समाजवादी पार्टी का साथ उन्होंने खुशी-खुशी चुना, जिसके नेताओं ने सरकार के लिए दूसरे दलों के सांसद हर कीमत चुकाते हुए जुटाए।
विपक्ष का मखौल उड़ाने के लिए मनमोहन ने विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी को ज्योतिषी बदलने की सलाह दी है तो आज के लेफ्ट नेताओं को नीचा दिखाने के लिए ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत को यूपीए का निर्माता बताने और उनके प्रति आभार जताने की चालाकी से भी वह नहीं चूके। विश्वासमत प्रस्ताव रखते हुए अपने भाषण का अंत उन्होंने गुरु गोविन्द सिंह की उक्ति के साथ किया। राजनीति समझने वाले हर शख्स को यह बात तुरंत समझ में आई कि यहां मकसद नैतिक वैधता पाना नहीं, बल्कि अकाली दल के सदस्यों को यह पैगाम देना है कि सिख प्रधानमंत्री के खिलाफ वे वोट न डालें। सवाल है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मनमोहन सरकार को समर्थन देने वाले दलों को क्या यह सांप्रदायिक कार्ड समझ में नहीं आया।
बहरहाल, सबसे अहम सवाल यह है कि क्या मनमोहन को अपनी कही बातें आज भी याद हैं, सीज़र की पत्नी को हर संदेह से ऊपर होना चाहिए...