मनमोहन सिंह फिलहाल सत्ता में बने रहेंगे और भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग समझौते को पूरा करने का अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से किया अपना वादा निभा सकेंगे, बशर्ते अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और न्यूक्लीयर्स सप्लायर्स ग्रुप में कुछ देशों की आपत्ति की वजह से इसमें बाधा न आए। (विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने माना है कि आईएईए और एनएसजी के सदस्य कई देश भारत-अमेरिका परमाणु करार की कई शर्तों पर असहमत हैं और इसीलिए इस करार को मंजूरी देने के कई प्रारूप वहां चर्चा में हैं। चूंकि अब सरकार वामपंथी दलों के समर्थन पर निर्भर नहीं है, इसलिए अब वह किसी भी प्रारूप को मान लेने को स्वतंत्र है)
बहरहाल, न तो विश्वासमत के पहले असली मुद्दा परमाणु करार था, और न अब है। मुद्दा करार का संदर्भ था और धीरे-धीरे यह बात साफ होती गई कि इस संदर्भ पर मनमोहन सिंह और वामपंथी दलों के मतभेद इतने गहरे हैं कि दोनों में बीच का कोई रास्ता निकलना मुश्किल है। ऐसे में कांग्रेस के सामने दो ही वैध और नैतिक रास्ते थे- या तो वह 2004 के चुनाव के जनादेश के मुताबिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय आम सहमति का ख्याल करती और परमाणु करार को ठंडे बस्ते में डाल देती या फिर करार को पूरा करने के लिए उस आम सहमति को तोड़कर नए सिरे से जनादेश पाने की कोशिश करती। लेकिन मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी उनकी पार्टी और उनके पीछे-पीछे पूरे यूपीए ने बगैर नया जनादेश लिए जनतांत्रिक मर्यादाओं को तोड़ते हुए अपने लिए संसदीय बहुमत गढ़ने की कोशिश की।
विश्वासमत प्रस्ताव के नतीजे से जाहिर है कि कांग्रेस पार्टी और यूपीए इस कोशिश में कामयाब रहे हैं। इस सफलता की वजह से यूपीए सरकार नौ महीने और सत्ता में बनी रह सकती है। साथ ही इस प्रक्रिया में यूपीए अमेरिकी सपने में जीने वाले देश के धनी, अभिजात्य और मध्यवर्ग के एक प्रभावशाली हिस्से का समर्थन पाने की होड़ में काफी हद तक फिलहाल सफल हो गया है। यही वजह है कि आमतौर पर भारतीय जनता पार्टी के प्रति सहानुभूति रखने वाले इन तबकों और इनसे नियंत्रित मीडिया में इस पूरे मामले में मनमोहन सिंह और उनके समर्थकों के प्रति भारी समर्थन देखा गया। दरअसल, विश्वासमत में मिली सफलता के पीछे इस समर्थन की भी एक भूमिका रही।
लेकिन यह सफलता बहुत बड़ी कीमत चुकाने से मिली है, जिसका अहसास शायद मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को अभी न हो। अमेरिकी सपने के साथ पूंजी की सत्ता, बहुसंख्यक वर्चस्व और सवर्णवादी मानसिकता का सीधा नाता है और इसीलिए भाजपा अपनी दक्षिणपंथी एवं सांप्रदायिक विचारधारा के साथ इन हितों की स्वाभाविक प्रतिनिधि है। अभी कांग्रेस को मिली वाहवाही की अकेली वजह इन तबकों की वामपंथ से एलर्जी है और चूंकि कांग्रेस अब वामपंथ के समर्थन पर निर्भर नहीं है इसलिए इन तबकों को उम्मीद है कि अब वह खुल कर आर्थिक एवं अन्य मामलों में उनके हितों के मुताबिक यानी नव-उदारवादी नीतियों के अनुरूप चलेगी।
बहरहाल, नीतियों पर चलने का नतीजा भाजपा 2004 में देख चुकी है। तब जनता ने कांग्रेस और उनके साथी दलों को इस उम्मीद में चुना था कि वे उन नीतियों का जनतांत्रिक विकल्प पेश करेंगे। ऐसा न करने का ही नतीजा रहा कि एक के बाद एक कई राज्यों में यूपीए की हार होती चली गई है। इस परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस और यूपीए को अकेला यूएसपी धर्मनिरपेक्ष-एकता थी, जिसकी मूल भावना से अब उन्होंने किनारा कर लिया है। इस एकता को तोड़ने की भरपाई उन्होंने अवैध और अनैतिक तरीकों से की है, जो पिछले एक पखवाड़े में मीडिया की रिपोर्ट्स और मंगलवार को संसद में नोट लहराए जाने की घटना से साफ हो गया है।
इसमें सबसे दुखद बात यह है कि कीचड़ सीधे प्रधानमंत्री और यूपीए अध्यक्ष पर पड़े हैं। मीडिया की खबरों के मुताबिक समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की जमीन मनमोहन सिंह ने खुद तैयार की। समाजवादी पार्टी के माध्यम से उन्होंने दूसरे दलों में तोड़फोड़ की रणनीति बनाई और समाजवादी पार्टी ने कॉरपोरेट जगत और अवांछित साधनों की मदद लेते हुए इसे अंजाम दिया। इन सभी प्रयासों को सोनिया गांधी का वरदहस्त मिला रहा। अगर इन खबरों पर भरोसा न भी किया जाए तब भी कई बातें साफ हैं, जो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की छवि पर सीधा असर डालते हैं। मसलन, जिन शिबू सोरेन को दागी मानते हुए महीनों से मनमोहन सिंह मंत्री बनाने से इनकार करते रहे, विश्वासमत में उनका समर्थन लेने के लिए न सिर्फ उन्हें मंत्री बनाने को तैयार हो गई, बल्कि सोरने की कुछ और मांगें भी मान लीं। अजित सिंह को खुश करने के लिए इसी मौके पर लखनऊ हवाई अड्डे का नाम चरण सिंह के नाम पर रख दिया। ये सब राजनीतिक घूस नहीं तो और क्या है?
साफ है, मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार जरूर बचा ली है, लेकिन देश का ऐतबार खो दिया है। कहा जाता हा कि इंसान की पहचान उसके दोस्तों से होती है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नए दोस्त कैसे हैं, यह देश को पता है, बल्कि कहा तो यह जा सकता है कि जब वैसे दोस्त हों तो दुश्मन की जरूरत क्या है?यह बात बहुत जल्द जाहिर होगी, जब नए दोस्त अपनी मांग रखेंगे। अभी तक कांग्रेस ने वामपंथी दलों के सिद्धांत आधारित समर्थन से सरकार चलाई, अब सौदा आधारित समर्थन पर जब वो चलेंगे तो उन्हें शायगद उसकी कीमत का फौरन अहसास न हो, लेकिन नौ महीने बाद अब जनता का विश्वासमत उन्हें जीतना होगा, तब उन्हें जरूर पता चलेगा कि उन्होंने क्या पाया और क्या खोया है।