पार्टी और परंपरा के बीच सोमनाथ
रवीश कुमार
नई दिल्ली,
मंगलवार,
जुलाई 22,
2008
संसदीय लोकतंत्र में स्पीकर की भूमिका कुछ संवैधानिक प्रावधानों से तय है तो कुछ संसदीय परंपराओं से। कई दशक तक संसदीय राजनीति के बाद स्पीकर के पद पर पहुंचे सोमनाथ चटर्जी ने उस पार्टी की निष्ठा दांव पर लगा दी जहां काडर होने पर सांसद होने से ज़्यादा अहमियत दी जाती है। सीपीएम और सोमनाथ दोनों इम्तिहान की घड़ी में थे। पार्टी उनसे निष्ठा मांग रही थी तो सोमनाथ स्पीकर की परंपरा देख रहे थे। इक्कीस जुलाई को ठीक दस बजे सोमनाथ लोकसभा के लिए रवाना हो गए। सीपीएम मुख्यालय पर सीताराम येचुरी ने बयान दिया कि सेंट्रल कमेटी में सोमनाथ चटर्जी को लेकर चर्चा हुई लेकिन क्या कार्रवाई होगी इसका फैसला पोलितब्यूरो करेगा। सीपीएम यह कहकर सोमनाथ को बताना चाहती है कि वह पार्टी से ऊपर नहीं हैं। सोमनाथ चुप रह कर बताते रहे कि स्पीकर से ऊपर कोई नहीं। वह सब पार्टी के लिए क्योंकि वह चुना ही जाता है कई दलों के वोट से। उसमें सदन के भीतर बहुमत का विश्वास होता है।
इसीलिए प्रभाष जोशी ने कहा कि विश्वास मत को लेकर जो राजनीतिक गंदगी फैलती दिख रही है उसमें सोमनाथ बेदाग निकलते दिखाई दे रहे हैं। एनडीटीवी इंडिया के कार्यक्रम में प्रभाष जोशी ने कहा कि सोमनाथ ने इस्तीफा न देकर स्पीकर की गरिमा को एक बीत्ता ऊपर कर दिया है। सीपीआई के अतुल अंजान कहते रहे कि सीपीएम ने जिस सरकार से समर्थन वापस ले लिया है उसका एक सांसद स्पीकर बनकर किसी परंपरा का निर्वाह नहीं कर रहा।
इस बहस से दूर सोमनाथ आसन पर बैठ चुके थे। उनका पूरा परिवार भी विश्वास मत की कार्यवाही देखने आया था। मीडिया को लगा कि शायद सोमनाथ ने इस्तीफा देने का मन बना लिया है इसलिए परिवार को बुलाया है। लेकिन किसी ने नहीं सोचा है कि परिवार को इसलिए भी तो बुलाया होगा कि सरकार रहे न रहे, यह लोकसभा रहे न रहे, तो कम से कम यह तो देखो कि तुम्हारे परिवार के एक सदस्य ने पार्टी छोड़ संसदीय परंपरा का कैसे निर्वाह किया है। सोमनाथ एक पार्टी के दस्तावेज में अब एक बदनाम शख्स के रूप में दर्ज हो जाएंगे लेकिन संसदीय इतिहास उन्हें मिसाल बना देगा।
विश्वास मत पर सरकार जीते या हारे लेकिन विश्वास मत की एक अग्नि परीक्षा में सोमनाथ जीत गए हैं। जहां सभी सांसद अपना दल, सिद्धांत छोड़ दूसरे से हाथ मिला रहे थे। शाहिद सिद्दीकी जैसा मतलबी सांसद जो एक दिन पहले तक डील को मुसलमानों के हित से जोड़ रहा था अचानक भावुक हो कर कहने लगा कि वह एक महीने से परेशान थे। क्या परेशानी थी उनकी जिसका इलाज हुआ मायावती के घर जाकर। इतनी ही परेशानी थी तो समाजवादी पार्टी से इस्तीफा देते और कहीं नहीं जाते। लेकिन पहले कहीं गए फिर इस्तीफे का ऐलान किया। इस तरह के कितने सांसद हैं जो शाहिद सिद्दीकी बन गए हैं। लेकिन सोमनाथ चटर्जी ने अपना स्तर इतना ऊंचा कर दिया जहां से किसी को शाहिद सिद्दीकी नज़र नहीं आएगा। दल-बदल होता रहेगा, दल बदलने वाले सरकार गिरा जाएंगे या बना देंगे लेकिन याद वो किया जाता है जो बचा रहता है, बिकने से, बहकने से। सोमनाथ चटर्जी कैसे बचे रह गए, शायद कम ही लोग सोमनाथ होते हैं इसलिए वो सदन में पूरे अधिकार के साथ काम करते नज़र आए। सांसदों को डांटते, उन्हें याद दिलाते कि उनका समय खत्म हो रहा है।