आधुनिकता और उच्च तकनीक के इस दौर में कोई इनसे अछूता नहीं है, तो भला कांवर वाले शिव भक्त कैसे पीछे रहेंगे। सावन के पहले सोमवार को वैसे तो बनारस में प्रति वर्ष की ही भांति शिव भक्तों का हुजूम दिखाई दिया, लेकिन इस बार जो अलग था वो ये कि लगभग प्रत्येक कांवरिया के हाथ में मोबाइल था और कान में इयरफोन।
बड़ी-बड़ी गाड़ियों पर बड़े बड़े डिजिटल साउंड बाक्स लगे हुए थे, तो उनके जरूरी साजो सामान में लैपटॉप ने भी अपनी जगह बना ली थी ताकि भक्ति के अलावा बचे हुए समय में देश दुनिया की खबरों से वे महरुम न रह सकें।
डीजे साउंड पर कानफोड़ू गानों की धुन पर मस्ती में झूमते हुए कांवरियों का हुजूम इस वक्त काशी की सड़कों पर दिखायी देना आम बात है। यह अलग बात है कि हाइटेक भक्तों को इन गानों पर भक्ति कम मौज मस्ती ज्यादा आती है।
गोरखपुर से आये रीतेश पांडेय जो कि प्रबंधन के छात्र हैं, उनके कंधे पर कांवर जरूर है लेकिन जेब में एन सीरीज का मोबाइल भी है, उनके साथ चल रही इनोवा गाड़ी में लैपटाप और डी वी डी प्लेयर भी है। यह पूछने पर कि तीर्थ यात्रा में इन चीजों का क्या काम, तो पांडेय बताते हैं कि मोबाइल के बिना जीवन अधूरा लगता है और लैपटाप इसलिए कि फुर्सत के क्षणों में अपने कम्युनिटी से जुड़ने का यही एक जरिया है।
इसी तरह इलाहाबाद से आए नवीन सचान का कहना है कि संचार के इस जमाने में मोबाइल के बिना कैसे रहा जा सकता है। मोबाइल से घर वालों को लोकेशन मिलती रहती है तो पैदल चलते समय गाना सुनते हुए रास्ता भी आसानी से कटता रहता है। नवीन और रीतेश की तरह ऐसे हजारों कांवरियों की पहली पसंद कांवर के बाद मोबाइल और वाकमैन हो गया है।
कांवर लेकर तीर्थयात्रा पर जाने वाले युवाओं के अभिभावक भी अपने बच्चों को कम से कम एक मोबाइल देकर भेज रहे हैं। एक अभिभावक आलोक बताते हैं कि पिछले दिनों कई सड़क हादसे हो जाने से बहुत डर लगने लगा है। मोबाइल से कम से कम हालचाल तो मिलता रहता है।
सावन शुरू होते ही पूरे उत्तर भारत की सड़कों पर कांवरधारी युवा तीर्थयात्रियों का हुजूम दिखाई देने लगता है। कहने को तो यह तीर्थयात्रा है लेकिन यदि यह कहा जाय कि गेरुआ रंग में रंगे ये भक्त कम मौज मस्ती और पिकनिक मनाने वाले दीवाने ज्यादा लगते हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
आने वाले एक महीने तक कांवरियों का यह माहौल काशी की सड़कों पर भी खूब दिखेगा, जिसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि आधुनिकता और प्रौद्योगिकी के इस दौर में सब कुछ मस्ती का साधन बनता जा रहा है चाहे वह भक्ति के लिए निकली तीर्थयात्रा ही क्यों न हो।