सचमुच लोकतंत्र में वोट बहुत क़ीमती होता है। हालांकि यह बात नागरिक शास्त्र और राजनीति शास्त्र की किताबों में लिखी होती है और नेता लोग आम आदमी को ख़ुश करने के लिए इसे दोहराते रहते हैं, लेकिन एक आम आदमी की हैसियत से मैं यही बात नेताओं के संदर्भ में कहना चाहता हूं।
एबी बर्द्धन और अमर सिंह ने सांसदों के वोटों की क़ीमत के बारे में जो ख़ुलासे किये हैं, उसके बाद अब मैं राजनीति के अर्थशास्त्र को नये सिरे से समझने की कोशिश कर रहा हूं। 22 जुलाई के विश्वास मत से पहले सांसदों के वोटों की नीलामी का खेल कुछ चुपके, कुछ खुलेआम परवान पर है। हालांकि इस खेल में अपराधी और सज़ायाफ्ता सांसदों को जेल से निकलवाने से लेकर अगले चुनाव में बीवी-बच्चों समेत टिकट का वादा, दूसरी कई तरह की डील और पूंजीपतियों और दलालों के इस्तेमाल तक के तमाम हथकंडे शामिल हैं, लेकिन इस लेख में हम सिर्फ उस अर्थशास्त्र को समझने की कोशिश करेंगे, जो हमारा लोकतंत्र हमसे समझने की अपील कर रहा है।
हम जैसी आम जनता की जानकारी में इस नीलामी में बोली एक वोट के लिए 25 करोड़ रुपये से शुरू हुई है। बकौल बर्द्धन इस नीलामी में पहली बोली सरकार की तरफ से आई- 25 करोड़। फिर क्या था- अमर सिंह के मुताबिक मायावती ने बोली लगाई- 30 करोड़। वो तो मुए मीडिया वालों की वजह से खेल थोड़ा ख़राब हो गया और अब इस नीलामी की अगली बोली प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुनने को नहीं मिल रही, लेकिन यक़ीनन पर्दे के पीछे बोलियां लगनी जारी हैं। चूंकि 22 तारीख में अब थोड़े ही दिन रह गये हैं, इसलिए अब तक ये बोली और ऊपर चली गयी होगी और कुछ जानकारों से बातचीत के बाद पता तो ये भी चला है कि विश्वास मत के दिन नीलामी में ये बोली अगर 50 या 100 करोड़ रुपये प्रति वोट तक पहुंच जाए तो हैरानी की बात नहीं।
हालांकि वोटों की ये बोली भारतीय लोकतंत्र में कोई पहली बार नहीं लगायी जा रही है, लेकिन उसकी नयी क़ीमत ग़ौर करने लायक है। यही जुलाई का महीना था और वर्ष 1993. नरसिंह राव की सरकार भी इसी तरह दाँव पर लगी थी। विपक्ष ने सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। 28 जुलाई को उस पर वोटिंग होनी थी, लेकिन उससे पहले वोटों की नीलामी का जो खेल हुआ, उसके परिणामस्वरूप दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री रहे राव के ख़िलाफ़ न सिर्फ़ चार्जशीट दाखिल हुई और सीबीआई ने उनसे पूछताछ की, बल्कि उन्हें अदालत के कठघरे में खड़ा होना पड़ा और गिरफ़्तारी से बचने के लिए अग्रिम ज़मानत भी लेनी पड़ी। यहां तक कि निचली अदालत में कसूरवार भी ठहराए गये। उस वक्त यानी आज से 15 साल पहले एक सांसद के वोट की क़ीमत लगी थी- सिर्फ़ 50 लाख रुपये। झारखंड मुक्ति मोर्चा के आरोपी चार सांसदों में से एक शैलेंद्र महतो ने ट्रायल के दौरान 50 लाख रुपये की रिश्वत मिलने की बात कबूल की थी और पंजाब नेशनल बैंक के नौरोजी नगर ब्रांच में इतने ही रुपये जमा कराये गये थे। ख़ैर, मुद्दे की बात ये है कि पिछले पंद्रह साल में एक सांसद के वोट की क़ीमत 50 लाख रुपये से बढ़कर कम से कम 30 करोड़ रुपये से लेकर 100 करोड़ रुपये तक पहुंच गयी है। यानी पंद्रह साल में कम से कम 60 गुणा से लेकर 200 गुणा तक ज्यादा। विडंबना देखिए, जनता इन दिनों बढ़ती महंगाई के लिए सरकार को कोसने में जुटी है, लेकिन ख़ुद सरकार के दर्द का उसे अहसास ही नहीं। आज सरकार को भी पता चल गया होगा कि महंगाई क्या होती है। इतनी महंगाई तो जनता को भी नहीं झेलनी पड़ रही।
आंकड़ों पर ज़रा और ग़ौर कीजिए। सरकार को मौजूदा 541 सांसदों के सदन में विश्वास मत हासिल करने के लिए 271 वोट चाहिए। लेख लिखे जाने तक यूपीए के हक़ में 261 वोटों की बात कही जा रही थी और विपक्ष के हक़ में 259 वोटों का आंकड़ा बन रहा था। यानी कांटे की टक्कर और जीत के लिए दोनों को कम से कम 10 या 12 वोट और चाहिए। यानी अंकगणित ये कहता है कि वोटों की नीलामी के इस खेल में कम से 20 सांसदों को उनके वोट की क़ीमत चुकाई जाएगी। अब जोड़िए। पर्दे के पीछे अगर एक सांसद के लिए कम से कम 30 करोड़ रुपये दिये जा रहे हैं, तो 20 सांसदों के लिए अंकगणित के मुताबिक कम से कम 600 करोड़ रुपये दिये जाएंगे। एक बार फिर दोहरा दूं कि ये आंकड़ा बर्द्धन और अमर सिंह के बयानों को संदर्भ में रखते हुए बनता है। अगर जानकारों के अनुमानों को ध्यान में रखें तो बीस सांसदों के 100 करोड़ X 20 = 2000 करोड़ रुपये तक बनते हैं। मज़ेदार बात ये है कि अगर सरकार बच भी जाती है तो ये अधिक से अधिक आठ महीने चलेगी, क्योंकि मार्च-अप्रैल 2009 में आम चुनाव होने ही हैं। यानी कम से कम 600 करोड़ रुपये से लेकर 2000 करोड़ रुपये तक का ये खेल सिर्फ़ आठ महीने सरकार चलाने या न चलने देने के लिए हो रहा है। देश में हर सांसद को अपने लोकसभा क्षेत्र के विकास के लिए साल में दो करोड़ रुपये मिलते हैं। अंकगणित के मुताबिक आठ महीने का ये एक करोड़ 32 लाख रुपये बनता है। देश में इस वक़्त लोकसभा की कुल 543 सीटें हैं। यानी इन आठ महीनों में समूचे देश के विकास के लिए सांसदों को 716 करोड़ रुपये मिलेंगे। इस आंकड़े पर इसलिए भी ग़ौर कीजिए कि देश के 543 सांसदों के पास इस वक़्त देश के 110 करोड़ की आबादी के लिए सिर्फ़ 716 करोड़ रुपये हैं यानी प्रति व्यक्ति साढ़े छह रुपये... और 20 व्यक्तियों के लिए 130 रुपये। लोकतंत्र में राजनीति के अर्थशास्त्र का सबसे मज़ेदार पहलू यही है। इस वक़्त जिन बीस सांसदों की झोली में 600 करोड़ रुपये से लेकर 2000 करोड़ रुपये तक जा रहे हैं, उनके पास अपने बीस वोटरों के कल्याण के लिए सिर्फ़ 130 रुपये हैं। वो भी पिछले अनुभवों को देखते हुए कहा जाए तो ज़्यादातर मामलों में या तो ख़र्च नहीं किये जाएंगे या फिर चट कर लिये जाएंगे।
अब इस अर्थशास्त्र में थोड़ी व्यावहारिकता का भी समावेश करते हैं। पाठक अगर मेरी धृष्टता को माफ़ कर सकें तो सवाल ये है कि सरकार बचाना या गिराना कौन चाहता है? आख़िर सरकार बचाने या गिराने के खेल में जुटे हुए लोगों को किन हितों की चिंता है कि वो आठ महीने सरकार चलाने या न चलने देने के लिए नैतिकता के दूसरे तमाम मापदंडों को धता बताने के अलावा 600 करोड़ रुपये से लेकर 2000 करोड़ रुपये तक की क़ीमत अदा करने को तैयार हैं? ज़ाहिर है अपने वोट का सौदा करने वाले सांसद और उनके वोट खरीदने वाले सौदागर देशहित में तो नहीं सोच रहे होंगे। वैसे भी नेताओं से आम आदमी का भरोसा जिस तरह से उठा है, उसे देखते हुए अगर एक आम आदमी की भाषा में कहा जाए तो इसमें ज़रूर उनके अपने स्वार्थ होंगे। इसका मतलब ये भी हुआ कि आज जो लोग आठ महीने के लिए 600 करोड़ से लेकर 2000 करोड़ रुपये तक का खेल कर रहे हैं, वो इन आठ महीनों में इससे कहीं कई गुणा ज़्यादा कमाई करेंगे। सरकार बचाने वाले सरकार में बैठकर कमाई करेंगे और गिराने वाले या तो उनसे कमाई करेंगे जो सरकार को नहीं चलने देना चाहते हैं या फिर अगली सत्ता हाथ में आने के बाद कमाई करने की उम्मीदों के साथ ये वक़्त काटेंगे। दोनों सूरत में चाहे जिसकी भी कमाई होगी, वो अंततः आम आदमी के टैक्स के पैसों से आएगी। वो पैसा भी आम आदमी का है, जो इस वक़्त सांसदों को दिये जाएंगे। और वो पैसे भी आम आदमी के ही होंगे जो इस खेल में जुटे लोगों द्वारा इसके बाद येन-केन-प्रकारेण कमाए जाएँगे। यानी हमारे और आपके कई हज़ार करोड़ रुपये इन आठ महीनों में साफ़ तौर पर देश के विकास के लिए नहीं, बल्कि अपने माननीय सांसदों की भूख मिटाने के लिए डूबने वाले हैं। और यह भी कि हमारे इन नेताओं के पास, चाहे वो सरकार में बैठे नेता हों या ख़िलाफ़ खड़े नेता हों, उन सबके पास इतना काला पैसा है, जिसका हम और आप कभी अनुमान भी नहीं लगा सकते। ख़ून-पसीने से कमाये हुए हमारे-आपके सफ़ेद पैसे को वो लगातार अपनी झोली में भर-भरकर काला कर रहे हैं।
सांसदों के वोटों की ये क़ीमत ये भी साफ़ कर देती है कि आख़िर किस दम पर और किस उम्मीद में राजनीतिक दल और प्रत्याशी चुनावों के दौरान पानी की तरह पैसा और ख़ून बहाने से भी नहीं हिचकते। इस वक्त चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में लोकसभा चुनावों के दौरान एक प्रत्याशी के लिए ख़र्च की सीमा 25 लाख रुपये बांध रखी है, लेकिन जानकार कहते हैं कि ख़र्च इससे कई गुणा ज़्यादा होता है- कम से कम 10 करोड़ रुपये और अधिक से अधिक की कोई सीमा नहीं। ताज़ा मोल-तोल से राजनीति नाम के “महाफ़ायदेमंद धंधे” का ये अर्थशास्त्र समझना मुश्किल नहीं है कि अगर सांसदों को सिर्फ़ एक वोट देने भर की क़ीमत 30 करोड़ से लेकर 100 करोड़ रुपये तक मिल जाए तो कौन चुनावों में 10-20 करोड़ रुपये का “निवेश” नहीं कर देना चाहेगा?
अब इस लेख को ख़त्म करते-करते इस महान लोकतंत्र में आम जनता के वोट की भी क़ीमत समझ लेते हैं। दिल से पूछिए कि आख़िर एक आम आदमी के वोट की क़ीमत इन नेताओं की नज़र में क्या है? ...क्या सिर्फ़ कोरे वादे या फिर चुनाव पूर्व की रात में चंद रुपये, कोई सस्ता-सा घिसा हुआ कंबल या एक पाउच शराब? ...और क्या हम ख़ुद अपने वोट की क़ीमत समझते हैं? अगर समझते होते तो यक़ीनन उससे जीतकर अपराधी, दाग़ी और बेईमान लोग देश की संसद और विधानसभाओं में नहीं पहुंचते। पिछले कुछ साल में तो राजनीति में एक नयी पौध आ गयी है, जो अपना ज़्यादा वक्त मुकदमे लड़ते और जेल काटते गुज़ारती है। वह भारतीय राजनीति में हाथी दांत के तस्करों की तरह है, जिसकी नज़र में शायद जनता के वोट की क़ीमत तो होती है, उसकी जान की क़ीमत नहीं होती है। ठीक वैसे ही जैसे तस्करों के लिए हाथी दांत की क़ीमत तो होती है, हाथी की जान की क़ीमत नहीं होती है। क्या यह किसी से छिपा है कि आज भी कमज़ोर तबकों के लोगों के कई इलाकों में जनता के पास वोट हाथी के दांत की तरह उसकी शोभा बढ़ाने का सामान भर है? …और शोभा बढ़ाने का ये सामान उल्टे कई बार उसकी जान का दुश्मन भी बन जाता है। चुनावों से पहले और दौरान होने वाली हिंसा इसका सबूत है। जनता के वोट की क़ीमत यही है कि उसके लिए पहले दहशत फैलायी जाती है, लोगों को वोट डालने से रोका जाता है और फिर बूथ लूटे और कूटे जाते हैं। यक़ीन नहीं आता तो इसी 22 तारीख़ को अपने देश की संसद में आप उन चेहरों को भी देख पाएंगे, जिनके लिए जनता का वोट लूटने और कूटने की ही चीज़ है। ये लोग भी सरकार बचाने और गिराने के खेल में पूरे सम्मान के साथ हिस्सा लेने वाले हैं। …और यक़ीन मानिए मुंहमांगी क़ीमत तो उन्हें भी अदा की जाएगी!