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 IST 20,  2008  23:35 नवंबर Last Updated :
कॉलम
रफ़ एंड टफ़
क्रांति संभव
नई दिल्ली, बृहस्पतिवार, जुलाई 17, 2008
टिप्पणियां:
पढ़ें (1)
बड़ा रफ बोलने लगे हो तुम...मां कई बार कहती थी बचपन में...बोली का रफ़ होना अपने आप में कई तरह के बदलावों को एक्सप्लेन कर देता था...जो भाषा से कहीं बड़े दायरे के बदलाव...रफ़ शब्द का बचपन से कई तरह का इस्तेमाल देखा है...रफ़ कॉपी, रफ़ कैल्कुलेशन/ एस्टीमेट , रफ़ एंड टफ़ इत्यादि-इत्यादि...लेकिन रफ़ बोली का तो महात्म्य ही अलग था...मैं यह नहीं कह रहा कि और कोई इसे इस्तेमाल नहीं करता है या था... बहुत से लोग करते हैं...बिहार में ज़रूर करते हैं....लेकिन मेरे लिए यह निजी स्लैंग था..और जैसे कि भारतीय निम्न मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी को कई तरह के पतन की शुरुआत मानता था (था, है नहीं)  तो शायद इसी मक़सद से, मेरे भाषाई पतन को अंग्रेज़ी शब्द से अंडरलाइन किया जाता था... ख़ैर वह हुआ या नहीं, इस पर मैं फैसला नहीं कर सकता, लेकिन यह ज़रूर मानता हूं कि यही वह जज़्बा रहा है, जिसने देश की ज़्यादातर बोली की मिठास बचाई हुई है...(कुछ को छोड़कर) चाहे वो मैथिली, बांग्ला, कोंकणी हों या उड़िया...और इसकी वजह केवल भाषा ही नहीं है...हमारा मिज़ाज, लहजा और एक हद तक तहज़ीब है...मृदुभाषी....अगर बड़े शहरों को छोड़ दें तो अभी भी लोगों की मुलायमियत (भावुक शब्द है, राजनैतिक नहीं) बरकरार है...न सिर्फ बोलने में, बल्कि व्यवहार में भी...चाहे ज़िंदगी की मारामारी कितनी ही बढ़ी हो, लेकिन बोलते वक्त अब भी लोग सोचते हैं कि बुरा न मान जाए कोई...ऐरोगेंस अब भी अंग्रेज़ी शब्द है, रूडनेस भी...यह भाव भी हमारे लिए विदेशी ही हैं...और जब कोई उसे हिन्दुस्तान में फिट करने की कोशिश करता है तो दिक्कत आती है...न तो वैसे बोलना हमारे लिए सहज है और न ही झेलना...और इस कोशिश में सब कुछ गड़बड़ा जाता है...जैसा शिंजिनी के साथ हुआ...शायद जजों के साथ भी...हालांकि नतीजा सिर्फ शिंजिनी ने भुगता...और जज टीवी चैनलों पर अधकचरी-सी सफाई देते नज़र आए...दरअसल हुआ यह कि बाकी जजों को कापी करते हुए वे अचानक ऐसे लहजे में पहुंच गए, जहां आलोचना की क्या सीमा रखनी थी, वह उन्हें पता ही नहीं चला... यह होता है, जब आप कॉपी कर रहे होते है...जो उनके साथ हुआ...जो बाकी के जजों के साथ हुआ, जो आजकल प्रोफेशनल जज बन गए हैं...असंख्य चैनलों पर दिन-रात असंख्य टैलेंट शो चल रहे हैं, जिनके लिए जज भी तो चाहिए...और चूंकि इसके लिए ज़्यादा टैलेंट की ज़रूरत नहीं होती, उसकी भरपाई होती है ऐरोगेंस से... वे हर कांटेस्टेंट से नाख़ुश होते हैं... वे गुस्सा होते हैं...जब तक आपकी बात सुनकर प्रतियोगी आंसू न बहाए, तब तक आप अच्छे जज नहीं होते...आप न सिर्फ़ उन्हें यह समझाते हैं कि उनका प्रदर्शन कितना निकृष्ट है... बल्कि यह भी विश्वास दिलाते हैं कि इस टैलेंट शो में असफलता के बाद उनकी ज़िंदगी बर्बाद है...जैसे एक वक्त में सीबीएसई साबित किया करती थी 12वीं के बोर्ड को लेकर...
 
एक यूरोपियन म्यूज़िक पर्सनैलिटी हैं...जो शायद यूरोप के सबसे अमीरों में से एक हैं...नाम है साइमन...वह भी जज हैं अमेरिकन आइडल के जो इंडियन आइडल का जनक है...ये जाने जाते हैं अपनी टिप्पणियों के लिए...कड़े-कठोर और कटु...ऐसी टिप्पणियां जो प्रतियोगियों को हिला दें...जिस प्रदर्शन को वह पसंद न करें उसकी भर्त्सना ऐसी करते हैं कि उस कांटेस्टेंट को आप विक्टिम की तरह देखने लगते हैं, दया आने लगती है उन पर...भर्त्सना-कटुता के साथ हिक़ारत की छौंक, लेकिन चेहरा सपाट...बिना किसी भाव के-बड़ी आसानी से वो हर बात बोलते हैं...ये साइमन का यूएसपी है...वह इसी के लिए जाने जाते हैं...और यह उनके लिए आसान है...मुझे नहीं लगता है कि उनके यहां यह नहीं कहा जाता कि बहुत रफ़ बोलने लगे हो तुम....लेकिन उनकी बातें सुन कर बहुत कम को ही मैंने रोते देखा है...थोड़े बहुत लोग रोते हैं, आंसू बहाते हैं...लेकिन ज़्यादातर ऐसे होते हैं, जो उससे भी ज़ोरदार, ठस्से से जवाब दे जाते हैं...कई तो मोटी-मोटी गालियां देकर जाते हैं साइमन को, शो से निकलने से पहले...जिस पर प्रोडक्शन टीम ख़ुशी-ख़ुशी बीप लगाती है...अच्छा टेलीविज़न बनता है यह... मेरे कहने के मतलब यह नहीं कि पूरी क़ौम मुंहफट है-बेहूदी भाषा वाली है...लेकिन यह सब उनके लिए सहज है...हमारे लिए शायद नहीं...या अभी नहीं...शिंजिनी के लिए बिल्कुल नहीं था...उसने सब कुछ गंभीरता से ले लिया...आने वाले वक्त में भी बहुत-सी शिंजिनी और दिखेंगी...और यही बात जजों के लिए भी होती है...अनु मलिक-इस्माइल दरबार-हीमेश रेशमिया-सख़्त होने के चक्कर में हास्यास्पद हो जाते हैं...और सिद्धू मतलब-बेमतलब जोक पर हंसते हुए भी सहज ही लगते हैं...अच्छे व्यूअरशिप और टीवी रेटिंग पाने के लिए इस तरह के कांटेस्ट में ऐसे तड़के की मात्रा कितनी हो...यह कोई नहीं जानता...और इसीलिए उस मात्रा के सही या ग़लत होने का पता चलता है शिंजिनी जैसे सिंपटम से...एक और नया रियेलिटी शो शुरू हुआ है या हो रहा है, जो दावा करता है कि वह टीवी का सबसे मीन (अंग्रेज़ी शब्द) टीवी शो है...और यह उसकी ख़ूबी है...शब्दकोशडॉटकॉम पर मीन शब्द का मतलब अधम, नीच और कमीना है...लेकिन मुझे लगता है कि यह शब्दार्थ आसपास के भावार्थ हैं। कुल-मिलाकर कोशिश है समझाने की...कि मीन होना ज़रूरी है...जैसे शाहरुख़ अलख जगाते हैं कि 'डोंट बी संतुष्ट' और यूनीलीवर भारतीय लोगों से निराश होती है कि भारतीय अपने शरीर से निकले पसीने की बू के लिए शर्मिंदा नहीं होते हैं...तो उन्हें शर्मिंदगी सिखाने के लिए कैंपेन करो और फिर डीओडरेंट बेचो...उसी तरीके से कैंपेन करना पड़ रहा है कि काइंया-चालाक-अधम-नीच नहीं होगे तो आगे नहीं बढ़ोगे...
 अब मशहूर क्विज़मास्टर डेरेक-ओ-ब्रायन ने देशभर के 500 स्कूलों में चिट्ठी लिखकर अपील की है कि बच्चों को टैलेंट-शो में न भेजा जाए, मां-बाप को मनाया जाए...लेकिन स्कूल कितना कर सकते हैं इसके बारे में मालूम नहीं...शायद ज़्यादा नहीं...स्कूल ख़ुद भी वैसे बच्चों से पब्लिसिटी पाते हैं और ऊपर से अगर मां-बाप ही भेजना चाहें तो फिर स्कूल क्या करेंगे...यह अभिभावकों की वह जेनरेशन है, जिसने अपना बचपन और अपनी किशोरावस्था अपने अड़ोस-पड़ोस के उस नौजवान की कहानी सुनते गुज़ारी है, जो फिल्म इंडस्ट्री में जाने के लिए घर से भाग गया था और वहां से असफल लौटा था...उसकी कहानी सुनकर निराश भी होते थे कि उन्होंने ऐसा रिस्क नहीं लिया और यह तसल्ली भी वे सबके सामने फेल नहीं हुए...लेकिन मन में नाम-शोहरत-एडवेंचर की चाहत तो थी ही, भले ही रिस्क-ज़्यादा मौक़े कम हों...और अब मौक़ा मिल रहा है तो वे बदलने की कोशिश कर रहे हैं...अपने बच्चों को सेलिब्रिटी-स्टार-बनाने के लिए...लेकिन पूरी तरह से नहीं बदल पाए हैं...अभी थोड़ा और रूड होना बाकी है...
 
इन सबको देखते हुए कई बार भरोसा टूटता है...लगता है कि अब सारे भारतीय उजड्ड और मुंहफट हो गए हैं...मां ने भी कहना छोड़ दिया है अब...लेकिन जब भी नए लोगों से मिलता हूं तो लगता है कि हालत उतनी बुरी नहीं है...अपने गांव जाता हूं तो लगता है कि हालत उतनी बुरी नहीं है...लखनऊ का अदब भले ही चुटकुला बना गया हो, लेकिन अभी भी लोग बचे हैं...और केवल देश ही नहीं...एक बार मोटरसाइकिल लेकर जापान में काफी लंबी टूरिंग की...जापानियों के साथ...वहां पर लगभग डेढ़ हज़ार किमी...जिस पर रफ़्तार का एपिसोड भी बनाया...तो वहां के नम्र लोगों को देख मैं कुंठा में चला गया...सड़क पर, ऑफिस में, गांव में शहर में, हाइवे पर, ज़ेब्रा क्रॉसिंग पर...हर जगह लोगों ने अदब से बात की और धन्यवाद कहा...लगा कि कितने विनम्र हैं ये लोग...और मैंने जब पूछा कि ऐसी जीवनशैली के बीच ऐसी विनम्रता कहां से बची या आई कहां से...उन्होंने जवाब दिया कि आप के ही देश से...
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मुझे आपका लेख बहुत अच्छा लगा। बस थोड़ा सा लम्बा था पर अन्त बहुत ही सुन्दर तरीके से किया गया है। सबसे अधिक खुशी इस बात की है कि आप जैस गैर राजनीतिक पत्रकर ... पढ़ें
दीपिका सिन्घ, leo_deepika87@yahoo.co.in, कान्पुर
 
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