• Sign Up
  • |
  • Sign-In Sign Out
  • |
  • Make us your home
  • |
  • RSS
1 42 Video %>
1 52 News %>
1 57 Photo %>
1 64 Interactives %>
1 69 Leisure %>
1 74 Filmhai %>
1 80 Auto Guide %>
1 141 Dharm and Sahitya %>
1 81 Astro %>
 IST 20,  2008  18:44 नवंबर Last Updated :
  • मालेगांव धमाकों की जांच पर एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे का बयान
  • किसी भी प्रकार का कोई राजनीतिक दबाव नहीं
  • मालेगांव धमाकों के आरोपियों पर एटीएस ने लगाया मकोका
  • 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया
  • 11 आरोपी भी होगा जल्द गिरफ्तार
  • 90 दिन तक हिरासत में रखने की बात कही
  • जज को जांच की प्रगति की जानकारी दी जा रही है
कॉलम
सिर्फ राजनेता हैं मनमोहन...
रवीश कुमार
नई दिल्ली, मंगलवार, जुलाई 15, 2008
टिप्पणियां:
पढ़ें (2)

मनमोहन सिंह का झक सफेद कुर्ता, नीली पगड़ी, सीधी चाल, कम संवाद... कुल मिलाकर ऐसी छवि बनाते हैं, जिससे लगता है कि मनमोहन राजनीति की काली कोठरी से बेदाग निकलते चले जा रहे हों। जिन लोगों ने साढ़े चार साल तक मनमोहन सिंह को गैर-राजनीतिक प्रधानमंत्री बताने की बहुत कोशिश की, उन्हें फिर से विचार करना चाहिए। इस देश में जहां हर बात पर राजनीति है, वहां कोई गैर-राजनीतिक आदमी गठबंधन का मुखिया नहीं हो सकता। जिसकी आर्थिक नीतियों से देश में बवाल मचा। फिर तमाम बड़े राजनीतिक दल उन्हीं नीतियों पर चलने लगे, ऐसा शख्स राजनीतिक नहीं होगा, यकीन करना मुश्किल है। मनमोहन की राजनीति का एक नतीजा तो सामने ही है - अमेरिका से चले आर्थिक नव-उदारवाद की आंधी का विरोध करने वाले लेफ्ट के नेता उन्हें साढ़े चार साल तक समर्थन देते रहे। कम बोलने का मतलब यह नहीं है कि मनमोहन राजनीतिक नहीं हैं... बल्कि वह राजनीति की मार-काट में चुप रहकर अपने लिए रास्ता बना लेते हैं।

वरना जापान जाते वक्त 35,000 फुट की ऊंचाई से मनमोहन बयान नहीं देते कि सरकार आईएईए में जाएगी। एक सिद्ध राजनेता की तरह बोलते हुए मनमोहन ने कहा कि वामदल हमारे लिए बहुत अहम सहयोगी हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण ज़रूर है कि परमाणु करार के मुद्दे पर हम एकमत नहीं हैं, परंतु मुझे अब भी आशा है कि कोई रास्ता निकल आएगा। यह विशुद्ध राजनीतिक बयान था, चालाकी भरा... मनमोहन ने जानबूझकर यह मौका चुना। यह जानते हुए कि उनके कैबिनेट सहयोगी प्रणब मुखर्जी ने गतिरोध समाप्त करने के लिए वामदलों और यूपीए समन्वय समिति की बैठक बुलाई थी। उधर प्रणब बातचीत का प्रस्ताव रख रहे थे, इधर प्रधानमंत्री बातचीत से आगे निकलकर करार पर बढ़ने का बयान दे रहे थे। इस तरह का काम कोई मंझा हुआ नेता ही कर सकता था। कांग्रेस में तमाम ऐसे नेता मौजूद हैं, जो मनमोहन से पूरे कार्यकाल के दौरान वरिष्ठ होने का दावा करते रहे, लेकिन उन्हीं की मौजूदगी में मनमोहन पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के ऐसे विश्वासपात्र बन गए कि उन्हें प्रधानमंत्री का पद ही सौंप दिया गया। ऐसा नहीं कि मनमोहन ही ऐसे नेता हैं, जो सोनिया की हर बात मानते हों, बल्कि कांग्रेस में सारे नेता ऐसे ही हैं। कोई नहीं है, जो अपने अध्यक्ष की बात का विरोध करेगा। फिर भी सोनिया के इतने नज़दीकियों में से अपने लिए प्रधानमंत्री पद हासिल करने लेने की बाज़ी मारी मनमोहन ने... और यह बाज़ी बिना राजनीतिक हुए नहीं जीती जा सकती थी।

एबी बर्धन कहते रहे कि प्रधानमंत्री जो बात ज़मीन पर नहीं कह सके, उसके लिए आसमान चुना। साफ है मनमोहन परमाणु करार पर अपनी सरकार के कदम के बारे में लेफ्ट को कोई जवाब नहीं देना चाहते थे। यह एक नेता की ही चाल हो सकती है, कोई गैर-राजनीतिक व्यक्ति ऐसा काम नहीं कर सकता था। अगर वह पूरी तरह से गैर-राजनीतिक होते तो प्रकाश करात को डील का ड्राफ्ट दिखा देते। जो ड्राफ्ट मीडिया को आसानी से मिल गया, उसके लिए प्रकाश करात को समर्थन वापसी की चेतावनी देनी पड़ी।

पहली नज़र में यह मामला सिर्फ मनमोहन का लगता है। कांग्रेस को जितनी बेचैनी लेफ्ट से अलग होने की नहीं थी, उससे कहीं ज्यादा मनमोहन की थी। कांग्रेस के पास क्या चारा था... क्या वह लेफ्ट के दबाव में अपने प्रधानमंत्री को फैसले से पलट जाने देती... मनमोहन सिंह अड़ गए तो बाकी के लिए कोई चारा नहीं बचा। उनकी बातों में कुछ न कुछ सख्ती ज़रूर रही होगी कि कई मुद्दों पर उन्हें रोक देने वाले करात भी इस बार धोखा खा गए। आडवाणी कमजोर प्रधानमंत्री का नारा देते रहे, लेकिन उन्हें भी नहीं लगा होगा कि कमज़ोर प्रधानमंत्री इस हद तक आगे बढ़ जाएंगे।

ज़ाहिर है मनमोहन सिर्फ एक राजनेता हैं। राजनीति करने वाले और जीने वाले नेता। अगर नेता नहीं होते तो यह बयान नहीं देते कि उनकी सरकार एक मुद्दे की सरकार नहीं है। अगर नेता नहीं होते तो अपने इसी बयान से पलटकर अपनी सरकार को एक मुद्दे की खातिर दांव पर नहीं लगाते। मनमोहन के इस दांव से देश में गठबंधन की राजनीति में भूचाल आ गया। ईमानदार प्रधानमंत्री नेता नहीं होते तो यूपीए की भोज बैठक में खुद चलकर अमर सिंह की टेबल तक नहीं जाते। वह नेता नहीं होते तो अमर सिंह के इस बयान का खंडन कर देते कि वह और मनमोहन अच्छे दोस्त रहे हैं। आजकल मुकेश अंबानी और सुनील मित्तल की मुलाकातें प्रधानमंत्री से बढ़ गई हैं। जब खरीद-फरोख्त की अटकलें बढ़ीं तो पीएमओ यह बयान नहीं जारी करता कि प्रधानमंत्री समय-समय पर आर्थिक नीतियों पर चर्चा करने के लिए इन उद्योगपतियों से मिलते रहते हैं। इस तरह का बयान सिर्फ एक मंझा हुआ राजनेता ही दे सकता है।

टिप्पणियां:
पढ़ें (2)
टिप्पणियां
रविश, मनमोहन सचमुच में एक राजनेता है। राजनेता की मजबूत राय से ही आम लोग सहमत होते हैं। वर्ना नेता तो बस केवल राजनीतिक मुद्दो में ही जनता को उलझाए रह्ते ... पढ़ें
राजीव पुरी, ultraflex7@yahoo.com, नागपुर
आदरणीय प्रधानमंत्री जी के बारे में लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
सुरेन्द्र गोसैन, msgosain@hotmail.com, नै दिल्लि
 
खोजें
फोकस
हालांकि सरकार कंपनियों को लगातार सलाह दे रही है कि वे नौकरियां लेने के बजाय कॉस्ट कटिंग का रास्ता अपनाए, लेकिन भारत में नौकरियां में कटौती अब हकीकत है...