एक तरफ भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक और सामरिक ताकत बनने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहा है... अमेरिका और दूसरे विकसित देशों से समझौते कर रहा है, ताकि उनकी बराबरी कर सके, एक विकसित देश कहला सके... लेकिन दूसरी ओर इसी देश के लाखों गांवों तक विकास की मद्धिम-सी रोशनी भी नही पहुंच पाई है। विकास की यह विभाजनकारी और पूंजीवादी नीति है, जो अमीरों को और अमीर और गरीबों को और गरीब बनाती है।
इसी का सबूत है बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को लांघता सिताबदियारा गांव, जो लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे दिग्गज राजनेता की जन्मस्थली है। जो जेपी विचारों और कर्म से अपने समय से बहुत आगे थे, उनकी जन्मस्थली वक्त की दौड़ में इतनी पिछड़ी रह गई कि उसमें देश की कोई आधुनिक सूरत नजर नहीं आती।
सिताबदियारा के कुछ हिस्से बिहार में हैं, कुछ उत्तर प्रदेश में। गंगा और सरयू के तट से लगे इस अति पिछड़े और बाढ़ग्रस्त दियारा में कुल 27 टोले हैं और आबादी है करीब 50,000... इसी के लालाटोला में, जो बिहार में पड़ता है, में 11 अक्टूबर, 1902 में जयप्रकाश नारायण का जन्म हुआ था, लेकिन बाद में वह उत्तर प्रदेश में पड़ने वाले हिस्से में जाकर बस गए। इसी गांव में आज साबरमती आश्रम की तर्ज पर बना जेपी आश्रम है, जहां उनके स्मृतिचिह्न सुरक्षित हैं। जेपी आश्रम, पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर एवं जेपी के सहयोगी व स्वतंत्रता सेनानी जगदीश भाई की कोशिशों से यहां प्रगति के कुछ नक्श तो जरूर पड़े हैं, लेकिन चन्द्रशेखर के नहीं होने से यह आश्रम भी उद्देश्यों से भटक गया है। जेपी की पत्नी प्रभादेवी के नाम बना पुस्तकालय भी बंद होने के कगार पर है। न किताबें हैं, न पढ़ने वाले। गांव के वे बुज़ुर्ग, जिन्होंने कभी जेपी के सान्निध्य में कंधे से कंधा मिलाकर एक युवा समाज का सपना देखा था, भी हालात से नाउम्मीद हो चुके हैं। 21वीं सदी में भी पूरा गांव 19वीं सदी वाला ही है। न शिक्षा का उचित प्रसार है, न दैनिक जरूरत के साधन ही उपलब्ध हैं। यहां तक कि गांव के अधिकांश हिस्से में बिजली तक नहीं पहुंच पाई है और जो मौजूदा सूरते-हाल है, उससे गांव में अगले दो दशक तक बिजली पहुंच भी नहीं पाएगी। बिजली न होने से इलाके में छोटे-मोटे उद्योग भी नहीं पनप पाए हैं। वैसे बिजली तो दूर, बाढ़ से सिताबदियारा को बचाने के लिए भी कुछ नहीं किया गया। मजबूरी में लोग रोटी की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
यहां के नेता भी चुनाव के समय तरह-तरह के वादे करते हैं। दो राज्यों के तीन संसदीय क्षेत्र आरा, बलिया और छपरा के सांसद इस क्षेत्र से जुड़े हैं। उनका मोटा वोट बैंक भी यहां हैं। इसके बावजूद यह गांव प्रगति की पहली सीढ़ी भी नहीं चढ़ पाया है। लोगों को लुभाने के लिए कभी बिजली के खंभे गाड़ दिए जाते हैं, लेकिन तार खींचने के पहले ही खंभे या तो टूट जाते हैं या चोरी हो जाते हैं। कभी सारे टोलों को सड़क से जोड़ने का ऐलान कर दिया जाता है, कभी समुचित बाढ़ प्रबंधन की बात होती है, लेकिन ज्यों ही चुनाव के नतीजों का ऐलान होता है, सारे दावे गंगा के पानी में बह जाते हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि जेपी के जन्मदिवस के मौके पर देश के नामी-गिरामी नेता इसी गांव से गुज़रकर जेपी आश्रम पहुंचते हैं, लेकिन काले शीशे वाली कारों में बैठे इन नेताओं को इस इलाके का पिछड़ापन शायद नज़र नहीं आता। जयप्रकाश नारायण ने कभी अपने गांव की पूरी ज़मीन दान में देकर एक बड़ी पहल की थी। आज़ादी के आंदोलन में कूदकर यहां के लोगों को संघर्ष का रास्ता सुझाया था। बाद में एमरजेंसी के दौरान लोकनायक बनकर उन्होंने देश के नौजवानों में ऐसी राजनीतिक चेतना पैदा की कि उस समय की इन्दिरा गांधी सरकार की चूलें हिल गईं। एक नई जागृति आई, नौजवान नेता सामने आए, राजनेताओं की एक नई और ऊर्जावान फौज खड़ी हुई और उम्मीद की जाने लगी कि देश का नक्शा बदल जाएगा, लेकिन सत्ता के सुख और ऐशो-आराम ने इन नेताओं की ऊर्जा हर ली। उस दौर में लाठियां खाने वाले कई नेता आज बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर आसीन होकर सत्ता सुख भोग रहे हैं। वहीं दूसरी ओर लोकनायक के इस गांव में न लोक बचा है, न नायक। बची है तो बस ग़रीबी, बेरोज़गारी, पिछड़ेपन और अशिक्षा की निशानियां...