लम्बी रस्साकशी के बाद वामदलों ने आख़िरकार यूपीए सरकार से नाता तोड़ ही लिया। शायद पहली बार एक ऐसे मुद्दे पर, जिस पर जनता में जाकर शायद ही कुछ वोट मिलें। इतना जबरदस्त राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ, जिसकी मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है। यूपीए की संकटमोचक बनकर आई समाजवादी पार्टी ने, न सिर्फ़ पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम का चेहरा दिखाकर एक तीर से दो निशाने साधे, बल्कि अपने मुस्लिम सांसदों के साथ बढ-चढ़कर फोटो खिंचवाए और बताने की कोशिश की कि भारत का मुस्लिम समाज न्यूक्लियर डील का समर्थन करता है। हालांकि उसके दो सांसदों ने पहले ही इस मुद्दे पर बग़ावत कर दी थी। इससे पहले एक लेफ्ट नेता ने भी मुस्लिम कार्ड खेला और कहा कि अगर समाजवादी पार्टी न्यूक्लियर डील पर यूपीए का साथ देती है तो उसे अमेरिका का साथी माना जाएगा और वह मुसलमानों से दूर हो जाएगी। हालांकि बाद में लेफ्ट पार्टियों ने अपने नेता के बयान से दूरी बनाने की कोशिश भी की।
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने मुलायम सिंह को होने वाले इस नुक़सान में भी अपना फायदा देख लिया और फ़ौरन ही प्रेस कॉन्फ्रेन्स करके कहा कि वह एटमी डील के ख़िलाफ़ हैं... ऐसा कहकर वह जताना चाहती थीं कि एक दौर में जॉर्ज बुश के ख़िलाफ़ मुहिम चलाकर चुनाव लड़ने वाले मुलायम सिंह की तरह उन्होंने मुसलमानों को धोखा नहीं दिया है, बल्कि वह उनके साथ हैं। उनकी इस बात पर मुहर लगाने के लिए दर्जन भर मौलाना भी बुलाए गए, जिन्होंने कैमरों के सामने 'कैट-वॉक' करते हुए कहा कि मायावती ही मुसलमानों की सच्ची हमदर्द हैं।
कुल मिलाकर, लेफ़्ट, समाजावादी पार्टी और बीएसपी सभी ने मुसलमानो की तरफ़ से बयानबाज़ियां कीं, लेकिन शायद ही इस बीच किसी ने यह जानने की कोशिश की कि ख़ुद मुसलमान इस बारे में क्या सोचते हैं। समाजवादी पार्टी के महासचिव शाहिद सिद्दीकी के ज़रिये चलाए जाने वाले अख़बार 'नई दुनिया' ने बहरहाल एक सर्वे किया, जिसमें बताया गया कि 70 प्रतिशत मुसलमान डील के हक़ में नहीं हैं। हालांकि बाद में उनसे इस सवाल का जवाब नहीं बन पड़ा कि अगर ज़्यादातर मुसलमान इस डील के ख़िलाफ़ है तो उनकी पार्टी द्वारा यूपीए सरकार को दिए गए समर्थन का औचित्य वह कैसे साबित करेंगे।
उर्दू मीडिया और ख़ासकर मुस्लिम मुद्दों पर चलने वाले ब्लॉग्स में यह मुद्दा महीने-भर से चर्चा का विषय बना हुआ है। उर्दू अख़बार 'राष्ट्रीय सहारा' ने प्रधानमंत्री के रवय्ये में बदलाव पर संपादकीय लिखते हुए कहा कि यह वही मनमोहन हैं, जिन्होंने कहा था कि उनकी सरकार एक मुद्दे की सरकार नहीं है और अगर न्यूक्लियर डील नहीं होती है तो दुनिया ख़त्म नहीं हो जाएगी। अख़बार दलील देता है कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी शक के दायरे से बाहर है, लेकिन इस डील को पूरा करके बीजेपी के ज़रिये सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री बताए जाने का प्रधानमंत्री जवाब देना चाहते हैं।
शायद यह जानकर कुछ लोगों को ताज्जुब होगा कि किसी भी अख़बार ने इस डील में ख़ासकर मुसलमानों का हित या अहित ढूंढने की कोशिश नहीं की, बल्कि अख़बार लिखते हैं कि निश्चित रूप से भारत को इस डील के फायदा होगा। हालांकि साथ में चेताया कि अमेरिका कई लिहाज़ से इस डील के बदले भारत को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है। लिखा गया है कि अगर भारत को न्यूक्लियर विस्फोट करने की ज़रूरत पड़े तो ऐसा न हो कि अमेरिका न्यूक्लियर इंटरपोल की हैसियत से भारत में आ धमके।
'सियासत' से लेकर, 'हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' तक लगभग सभी उर्दू अख़बारों ने लिखा है, यह डील दुनिया की न्यूक्लियर बिरादरी में भारत को एक दर्जा दिलाएगी, भारतीय घर बिजली से रोशन होंगे, लेकिन भारत को ध्यान ऱखना चाहिए कि कहीं यह देश की आज़ादी का सौदा तो नहीं। twocircles.net, Indianmuslim.in, goodindian.com जैसी वेबसाइट्स जिरह करती हैं कि भारत को यह सौदा करते वक़्त सचेत रहना होगा कि भारत कहीं इराक़ वाली स्थिति में न पहुंच जाए, जहां काग़ज़ पर तो एक स्वतंत्र राष्ट्र की बात हो, लेकिन एक छोटा क़दम उठाने के लिए भी वॉशिंगटन के दरबार में हाज़िरी लगानी हो।
इन वेबसाइटों पर बेबाकी से अपनी राय रखते हुए जहां कुछ लोगों ने इस डील से होने वाले फायदों पर ही सवालिया निशान लगाया है कि किस हद तक डील देश की ऊर्जा की ज़रूरतों को पूरा करेगी। अंधेरे घरों में उजाला किसको नागवार होगा, लेकिन जिस तरह से अलग-अलग मंत्रालयों के काम में अमेरिका अभी से दख़ल दे रहा है, लगता है इस डील के बाद मल्टीनेशनल कम्पनियों का दबदबा भारत में और बढ़ेगा।
'राष्ट्रीय सहारा' ने लिखा है कि तीसरी दुनिया की ताक़त को मज़बूत करने की बात करने वाले प्रधानमंत्री, लगता है दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त के आगे झुक गए हैं। काश, प्रधानमंत्री ऐसी योजनाओं पर अपनी ऊर्जा खर्च करते और अपनी निजी प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाते, जिससे उन 70 प्रतिशत लोगों की ज़िंदगी को सुधारने में मदद मिलती, जो सिर्फ़ एक डॉलर रोज़ में अपनी ज़िदगी गुज़ार रहे हैं।
लगता नहीं कि मुस्लिम हितों और वोटों की इतनी फिक्र करने वाले नेताओं ने कभी यह जानने की कोशिश भी की होगी कि आख़िर देश के मुस्लिम समाज के लिए शायद ही ये भावनात्मक मुद्दे कोई मायने रखते हों।