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कांग्रेस का वफ़ादार बाग़ी - अर्जुन
रवीश कुमार
नई दिल्ली, मंगलवार, मई 13, 2008
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कांग्रेस में रहते हुए जिस पंडित जवाहर लाल नेहरू को दिए वचन को निभाने की बात अर्जुन सिंह कर रहे हैं, उन्हीं नेहरू ने चुनावी मंच से उनके पिता शिवबहादुर सिंह को हरा देने की अपील की थी। किस्सा कुछ यूं है कि 1952 में रीवां में पहला चुनाव हो रहा था, और अर्जुन के पिता शिवबहादुर सिंह कांग्रेस के उम्मीदवार थे। उनके प्रचार के लिए मंच पर मौजूद पंडित नेहरू से किसी ने कान में कह दिया कि शिवबहादुर सिंह को धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी के मामले में सज़ा सुनाई गई है... बस, नेहरू ने मंच से ही शिवबहादुर सिंह को हरा देने की अपील करते हुए कहा कि मुझसे ग़लती हुई है। शिवबहादुर सिंह हार गए और बाद में सुप्रीम कोर्ट से भी सज़ा हुई। उनकी मौत जेल में हुई थी।

वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता की किताब 'राव के बाद कौन' में वर्णित यह घटना आज के अर्जुन के बारे में बहुत कुछ बताती है। आलोक लिखते हैं कि तब अर्जुन अपने पिता को अपमानित करने वाले लोगों को कभी न भूलने की कसम खाते हुए राजनीति में उतरे थे। आज कांग्रेस की 47 साल से ज़्यादा राजनीति करने वाले अर्जुन ख़ुद को नेहरू के प्रति निष्ठावान बताते हैं तो उन पर कितना यकीन किया जा सकता है, इसके कयास लगाए जा सकते हैं।

हाल ही में अपने ऊपर लिखी किताब 'मोहि कहां विश्राम' के विमोचन के मौके पर अर्जुन ने फिर ऐसा कह दिया, जिससे पार्टी में बवाल मचा है। इससे पहले भी वह बयान देकर संतुलन बनाने का खेल खेलते रहे हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने आलोक मेहता को कहा था कि अपना संतुलन बनाए रखना मेरे राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

इसी उपलब्धि के कारण अर्जुन सिंह विरोध करने के बाद भी पार्टी के भीतर बने रहते हैं। विमोचन के वक्त उन्होंने कहा कि पार्टी में वफादारी का सीमित मतलब निकाला जा रहा है, लेकिन वह नेतृत्व के प्रति वफादार हैं। बाद में जब पार्टी के नेता और सोनिया गांधी उनसे किनारा कर गईं तो खंडन करने लगे। कहा कि वह किताब मेरी आत्मकथा नहीं है, आत्मकथा तो अब लिख रहा हूं। अब फिर कह दिया कि मैं मायूस नहीं हूं।

इन सब बयानों से अर्जुन अपने धनुष को कितना संतुलित कर रहे हैं, वहीं जानते होंगे। कुछ दिन पहले कह दिया कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। इसी बयान को लेकर 10, जनपथ में उनकी पेशी हो गई। इस बार भी उनके तरकश से निकला तीर न निशाने पर लगा, न वापस आया। पार्टी का यह धनुर्धर किसके साथ है और क्या कहना चाहता है, समझना मुश्किल है।

अर्जुन सिंह की राजनीति गुटबाज़ी से ऊपर नहीं उठ पाती। वह गुटों को संतुलित करने में ही खप जाते हैं। नरसिंह राव, जितेंद्र प्रसाद के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले अर्जुन सिंह उसी मोर्चे के साथ जा मिलते हैं। कांग्रेस के भीतर उनके साथ खड़े होने वाले लोग कम हैं, इसलिए उन्हें अपने बयान का खंडन करना पड़ता है। कई राजनीतिक जानकार अर्जुन के इस खेल को उनके बाग़ी तेवर से जोड़ते हैं, लेकिन आलोक मेहता का यह लेख उस अर्जुन को समझने में काफी मदद करता है, जो सिर्फ नाम का अर्जुन है। जिसके निशाने में न दम है, न नीति, और न नीयत।

एक बाग़ी जब वफादारी की बात करे तो समझना चाहिए कि वह बाग़ी नहीं है, संतुलन के ज़रिये अपनी जगह बनाना चाहता है। वरना उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण की पहल करने वाले अर्जुन सिंह अपनी कही बात पर अड़े रहते और पार्टी के भीतर लोकतंत्र की बहाली का संघर्ष करते रहते और इसके लिए अपना मंत्री पद गंवाने का जोखिम भी उठाते। अर्जुन तो मंडल की राजनीति करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह भी नहीं बन पाए। कांग्रेस की भी एक मजबूरी है - वह अर्जुन से किनारा तो करती रहती है, लेकिन हाथ नहीं झाड़ती। इस रिश्ते का राज़ तो अंदरखाने की राजनीति के जानकार ही समझते होंगे, लेकिन फिलहाल कांग्रेस में किसे फर्क पड़ता है कि अर्जुन मायूस नहीं हैं।

टिप्पणियां:
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टिप्पणियां
मुझे यह खबर अच्छी लगी, पर बेलेन्स का अभाव लगा।
अनिल पटेल, patel_anil25@rediffmail.com, अहमदा्बाद
अच्छा लगा।
पटेल अनल क, patel_anil25@rediffmail.com, अह्मेदबद
 
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